संकट में विद्या और विद्यालय

कहते हैं इस पूरी दुनिया में सिर्फ विद्या ही एक ऐसी चीज है जिसे अग्नि जला नहीं सकती, वायु उड़ा नहीं सकती, जल बहा नहीं सकता, चोर चुरा नहीं सकता, कोई आपसे छीन नहीं सकता मगर जब से इस कोरोना नामक महामारी ने इस दुनिया में दस्तक दी है तब से यह लगता है कि जीवन में कोई भी चीज संभव और असंभव जैसी नहीं रह गई।

एक दौर था जब गुरुकुल में शिक्षा दी जाती थी और बच्चे बड़े ही साधारण ढंग से प्रतेक तरह की विद्या अर्जित किया करते थे, यह शिक्षा का वह दौर था जब राजमहल में रहने वाले बच्चे भी इन्हीं गुरुकुल में अध्ययन के लिए आया करते थे खुले मैदानों में वृक्ष कि छाव में पढ़ने वाले विद्यर्थियों में अपने आप ही एक सामाजिक दूरी बनी रहती थी समय बदला हम गुरुकुल से विद्यालय की तरफ बढ़ चले जहां बड़ी बड़ी इमारतों को शिक्षा का केंद्र बना दिया गया जिन्हें हम सब ने नाम दिया विद्यालय।

बदलते समय के साथ इन विद्यालयों में बच्चो को पारंपरिक, आधुनिक और वैज्ञानक शिक्षा दी जाने लगी तो विद्यालयों के बड़े बड़े नाम होने लगे जिन विद्यालयों में अपने बच्चों का दाखिला करा माता – पिता को भी एक खुशी का अनुभव होने लगा , इन विद्यालयों में वो माता -पिता भी अपने बच्चो को पढ़ाने लगे जो इतने सक्षम नहीं है क्योंकि इन विद्यालयों का शुल्क इतना अधिक होता है कि हर कोई इन विद्यालयों में अपने बच्चों को नहीं पढ़ा सकता लेकिन माता- पिता दिन रात मेहनत कर बच्चो को पढ़ते हैं, इसलिए कि उनके बच्चे इस आधुनिक युग में पीछे ना रह जाए, लेकिन आज मनुष्य के जीवन में कुछ ऐसा हुआ है कि जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी “कोरोना महामारी “जो मनुष्य के जीवन में स्थिरता ले आई। जिसने लोगो के बीच सामाजिक दूरी बना दी है अब इस सामाजिक दूरी के नियम का पालन करते हुए विद्यालयों में बच्चो को विद्या अर्जित कराना बड़ा ही कठिन काम बन गया है जिन विद्यालयों में १००-२००बच्चे पढ़ते हो वहां इस नियम का पालन संभव ही नहीं है इसके चलते विद्यालय बंद पड़े है और बन्द पड़ी है बच्चो कि शिक्षा और साथ ही साथ बंद पड़ी है उन विद्यार्थीओ कि उम्मीदें जो अपने लिए कुछ सोच के बैठे थे, इस महामारी ने सबकी उम्मीदों और आशाओं पर पानी फेर दिया है ।

जिन बच्चो के माता-पिता शिक्षित हैं वो तो अपने बच्चो को फिर भी घर में थोड़ा बहुत पढ़ा लेते है मगर उन बच्चो के माता -पिता जो पढ़े लिखे नहीं है उनके लिए ये कर पाना बड़ा कठिन काम है वो तो ठीक से अपने बच्चो को यह तक नहीं बता पाएंगे की उनके बच्चे सही पढ़ रहे हैं या गलत । कहीं किसी के पास पढ़ने के लिए भी नहीं भेज सकते क्योंकि महामारी का ऐसा डर लोगो के बीच बैठ गया है कि आज मनुष्य- मनुष्य से दूर रहने लगा है और हो भी क्यों ना यह छुआछूत की बीमारी की तरह ही फैलने वाली बीमारी है । विद्यालय बंद तो विद्यालयों के शिक्षकों का वेतन भी संकट के कटघरे में आ खड़ा हुआ है विद्यालय के मालिकों के द्वारा दिया जाने वाला वेतन शिक्षकों के घर को चलाने का एक मात्र साधन है, इस वेतन से ना जाने कितने लोगो की उम्मीद जुड़ी हुईं होती है मगर किया क्या जाए, जब विद्यार्थी विदयालय आते थे तो शुल्क भी समय पर आता था जिससे शिक्षकों का वेतन समय पर मिल जाता था, सबसे ज्यादा चिंता का विषय तब बन जाता है जब किसी- किसी का परिवार सिर्फ इसी वेतन पर चलता है इस महामारी ने सामाजिक दूरी का ऐसा पाठ पढ़ा दिया है कि अभिभावक अपने बच्चो को विद्यालय भेजना ही नहीं चाहते है अब ऐसे में विद्यालय खुल भी जाए तो शिक्षक विद्यालय आ कर करेगें क्या ?

जहां आधुनिकता की दौड़ में हम एक छड़ की देरी सहन नहीं कर पाते थे वहां विद्यालय जैसे संस्थान में स्थिरता आयी पड़ी ह, बच्चो का भविष्य कुछ धुंधला सा दिखाई पड़ता है, क्योंकि हम एक वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं तो इसका एक तोड निकाला गया जिसे हम ऑनलाइन शिक्षा का नाम देते हैं। यह शिक्षा आधुनिक यंत्रों पर दी जाने लगी है जैसे मोबाइल और कंप्यूटर यह उनके लिए कुछ हद तक ठीक है जो बच्चे बड़े और समझदार हैं, लेकिन उन बच्चो का क्या जो अभी इसका अर्थ तक नहीं समझते । इस तरह से दी जाने वाली शिक्षा ना तो बच्चो को ठीक से समझ आ रही है और ना ही अभिभावकों को। इससे विद्यार्थीओ की आंखो पर एक हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है साथ ही साथ कई घंटो इन यंत्रों के प्रयोग से विद्यार्थियों की मानसिकता पर भी असर पड़ रहा है।

विद्यालय में जाने से विद्यार्थियों का ज्ञान विकसित होता था लेकिन इस ऑनलाइन शिक्षा से ज्ञान सीमित हो कर रह गया है। ऐसे बच्चे फिर भी कुछ पढ़ भी लेगे जिनके अभिभावक बच्चों के साथ पूरी मेहनत करके उन्हें पढ़ाएंगे , लेकिन उन बच्चो का क्या जिनके अभिभावक पढे लिखे नहीं है। हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार और विद्यालय के मालिकों को मिल कर कुछ ऐसा रास्ता निकालना चाहिए कि जिससे विद्यार्थीओ की विद्या की हानि ना हो बच्चो को यंत्रों का सहारा ना लेना पड़े और विद्यालय के शिक्षक, विद्यार्थी और विद्यालय सुरक्षित रहे क्योंकि विद्यार्थी से ही विद्यालय होता है ।

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